यह उन दीर्घ कणों (कार्बोहाइड्रेट, वसा, और प्रोटीन) का चयापचय या रस प्रक्रिया (मटैबलिज़म) है, जिनको पचाया जाता है, जिसे तोड़ा जाता है और जिनका छोटे-छोटे घटकों में ऑक्सीकरण किया जाता है। तब ये शरीर के कोशाणुओं द्वारा लिए जाते हैं और जब ये कण निश्चित किण्वक (एन्ज़ाइम) के द्वारा क्रियाशील किए गए चयापचय (मटैबलिज़म) क्रिया के विभिन्न रास्तों से होकर गुज़रते है तो ये कणों को ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है।
कार्बोहाइड्रेटस केटाबोलिज़्म का अर्थ है - स्टार्च (अनाज का सत्व), सुक्रोस (ऊख की चीनी) और लेक्टोज़ (दुग्ध शर्करा) कार्बोहाइड्रेटस का विघटन । लेक्टोज़ (दुग्ध शर्करा) अत्यधिक छोटे छोटे विभागों (यूनिट) का निर्माण करता है – जैसेकि ग्लूकोज़ (अंगूर से निकाली गई शक्कर), फ्रुकटोज़ (फ़लों से निकाली गई चीनी) और गालाक्टोज़ (दुग्ध संबंधी) । भोजन के पचने से प्राप्त मोनोसचराइडस को नस के द्वारा आंत से जिगर (लीवर) तक पहुंचाया जाता है। इनका उपयोग सभी ऊतकों (टिस्यू) के द्वारा ऊर्जा के लिए सीधे तौर पर किया जा सकता है या इन्हें जिगर (लीवर) या मांसपेशियों में ग्लायकोजेन के रूप में कुछ समय के लिए जमा किया जा सकता है या फिर चर्बी, अमीनो एसिड (अम्ल) और अन्य जैविक मिश्रणों के रूपों में परिवर्तित किया जाता है। सामान्य तौर पर कार्बोहाइड्रेट्स शरीर को उसकी आवश्यकता का आधे से अधिक हिस्से की ऊर्जा प्रदान करता है।
ग्लूकोज़ (अंगूर से निकाली गई शक्कर) के एक कण के मटैबलिज़म (रस प्रक्रिया) से ए-टी-पी (ऊर्जा का मुख्य स्त्रोत) के 31 कण उत्पन्न करता है। तब ए-टी-पी से निकली हुई ऊर्जा जैविक कार्य के लिए उपयोग में लाई जाती है। कार्बोहाइड्रेट रस प्रक्रिया ग्लायकोसिस के साथ शुरू होता है, जो ग्लूकोज़ से या ग्लायकोज़ेन से ऊर्जा निकालती है। अतिरिक्त ग्लूकोज़ को ग्लायकोज़ेन में बदलने की प्रक्रिया को ‘ग्लायकोज़ेनेसिस’ कहते हैं। ग्लायकोजेन को ग्लूकोज़ में परिवर्तित करने की प्रक्रिया को ‘ग्लायकोजेनोलिसिस’ कहा जाता है। (यह प्रक्रिया भोजन खाने के कई घंटो के बाद या रात भर में संपन्न हो सकती है)। यह प्रक्रिया लीवर में हो सकती है या मांसपेशियों में ग्लूकोज़-6-फ़ास्फ़ेट की अनुपस्थिति में हो सकती है या दूध देने के लिए हो सकती है। ऐसे स्त्रोतों के माध्यम से, जो कार्बोहाइड्रेट के स्त्रोत न हों, ग्लूकोज़ का निर्माण करने की प्रक्रिया को ‘ग्लूकोनेओजेनेसिस’ कहा जाता है। जैसे कि जब कार्बोहाइड्रेट की सीमित मात्रा का सेवन किया गया हो, तब कुछ निश्चित अमीनो एसिड और चर्बी के ग्लायसरोल फ़्रेक्शन। ‘ग्लूकोनेओजेनेसिस’ की प्रक्रिया के लिए जिगर (लीवर) मुख्य स्थान है। कार्बोहाइड्रेट रस प्रक्रिया के विकारों में डायबीटिज मेलिटस, लेक्टोज़ इनटोलरेंस (दुग्धशर्करा असहिष्णुता) और गालाक्टोसेमिआ जैसे विकार शामिल हैं।
प्रोटीन में कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन और कभी कभी अन्य अणु विद्यमान रहते हैं। प्रोटीन का केटाबोलिज़्म एक आवश्यक पाचन की प्रक्रिया है। कोशिकाओं में पहुंचने के लिए पाचन क्रिया प्रोटीन को तोड़कर अमीनो एसिड और सरल डेरिवेटिव मिश्रण में बदल देती है। यदि अमीनो एसिड की मात्रा शरीर के जैविक ज़रूरतों के हिसाब से अधिक है, तो बाद में इनका उपयोग ‘एनर्जी मटाबोलिज़्म’ के लिए किया जाता है। सभी आवश्यक अमीनो एसिड के केटाबोलिज़्म के लिए लीवर मुख्य स्थान है। बीमारी के दौरान या बहुत दिनों तक भूखे रहने के दौरान जब ऊर्जा के लिए भोजन की आपूर्ति पर्याप्त नहीं होती है, तो शरीर में विद्यमान प्रोटीन को तोड़ा जाता है। लीवर में विद्यमान प्रोटीन का उपयोग अन्य ऊतको (टिस्यू) में विद्यमान प्रोटीन की तरजीह पर किया जाता है, जैसे कि मस्तिष्क ।
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